गीता से सीखें जीने की कला

मान्यता है कि श्रीमद्भगवद्गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी है। इसके प्रत्येक श्लोक में ज्ञानरूपी प्रकाश है, जिसके प्रस्फुटित होते ही अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है।

यद्यपि गीता द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के समय रणभूमि में किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा कही गई थी, किंतु इस वचनामृत की प्रासंगिकता आज तक बनी हुई है।

गीता पाठ से भगवान का सानिध्य मिलता है। जीवन की बड़ी से बड़ी परेशानी व्यक्ति को कर्तव्य पथ से विचलित नहीं कर पाती। गीता का अभ्यासी संसार का सच जान लेने के बाद पथभ्रष्ट नहीं होता।

यदि आप समस्याओं के भंवर में डूब रहे हैं, तो गीता उबार लेती है। गीता में ज्ञानरूपी वह संजीवनी है, जो निराश मन में आशा के प्राण फूंक देती है। यह झंझावात भरे माहौल में भी जीने की कला सिखाती है।

गीता में सारे शास्त्रों का सार निहित है। मान्यता के अनुसार चूंकि गीता स्वयं भगवान की वाणी है, अतः उसे सभी शास्त्रों से बढ़कर कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जैसे मक्खन दूध का सार है, उसी प्रकार गीता सब उपनिषदों का निचोड़ है।

पुराणों के रचयिता व्यास जी का मानना है- सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः। पार्थो वत्सः सुधीभोंक्ता दुग्धं गीतामृतं महत॥ अर्थात् समस्त उपनिषद गाय के समान हैं, भगवान श्रीकृष्ण दुहने वाले हैं, पार्थ बछड़ा है, गीता रूपी ज्ञानामृत ही दूध है। सद्बुद्धि वाले जिज्ञासु (ज्ञान पिपासु) उसके भोक्ता हैं।

गीता ज्ञान का वह समुद्र है, जिसमें जितने भी गोते मारो, उसकी थाह नहीं मिलती। गीता के प्रत्येक श्लोक के अनेक अर्थ-भावार्थ निकाले जा सकते जा सकते हैं। जितने भाष्य गीता पर लिखे गए हैं, उतने किसी अन्य ग्रंथ पर नहीं।

गीता रूपी रत्नाकर में गोता लगाने पर जो भाव रत्न जिसे उपलब्ध हुए, उसने उनको अपनी टीका की झोली में भर दिया।
गीता की अनंत भाव रत्न राशि इससे आज तक न तो समाप्त हुई न ही भविष्य में हो पाएगी। आप गीता को जितनी बार पढ़ेंगे, हर बार कोई नई बात आपको जरूर मालूम पड़ेगी।

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