चंडीदास के लिए हर स्त्री राधा है और हर पुरुष
बंगाल के बीरभूम इलाके में घूमिए तो जिस तरह बासंती हवाएं सुगंधित कोमल फूलों की वर्षा करती हैं, वैसी ही चंडीदास के गीतों की रिमझिम होती रहती है। उनके गीत इतने रसभरे हैं, इतने मानवीय हैं, उन्होंने राधा और कृष्ण के प्रेम की महीन भंगिमाओं को इतनी सुंदरता और सहजता से वाणी दी है कि वे सहज ही लोक गायकों की जबान पर चढ़ गए हैं।
 
संभवत: चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी के बीच पैदा हुए चंडीदास एक तांत्रिक वैष्णव थे और किसी गांव में बाशुली देवी के मंदिर में पुजारी थे। मंदिर के पास एक नदी थी जिस पर गांव के धोबी कपड़े धोया करते थे। वहां रामी नाम की एक धोबिन भी आती थी। अपना काम करते हुए वह दिल खोल कर गाती और चंडीदास घंटों बैठकर उसे सुनते। ऐसे में दोनों के बीच प्रेम न होता तो ही आश्चर्य था।
 
चंडीदास उसके प्रेम में इस तरह डूबे कि उस प्रेम से उनके गीत उपजने लगे। इसीलिए उनके गीतों में रोमांस था और कामोन्माद भी था। लेकिन वह ज्योति शिखा की तरह ऊर्ध्वमुखी था। उसकी लौ ऊपर उठती हुई, वासना से निर्वासना की ओर, आसक्ति से भक्ति की ओर जाती थी।
 
चंडीदास के मन का द्वंद्व उनके काव्य में व्यक्त होता है। वे बाशुली देवी से पूछते हैं, यदि रामी मेरे लिए तेरे से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है तो मैं क्या करूं ?फिर खुद ही बाशुली की ओर से उत्तर लिखते हैं, अपनी इंद्रियों के मोह को जीतकर इस स्त्री से प्रेम करो। वह तुम्हें हृदय की जो पवित्रता देगी, वह कोई देवता नहीं दे सकता। इस गीत में चंडीदास की प्रेम कहानी गुंथी हुई है। वासना लिली के सफेद फूल जैसी खिली है, जहां हृदय की मूर्ति रहती है।
समाज और वर्ण व्यवस्था के सारे नियमों को तोड़कर चंडीदास रामी के साथ रहने लगा। उन्हें इस बात की जरा भी चिंता नहीं थी कि लोग उन्हें पगला चंडी कहते थे। कहते हैं, बाशुली देवी से उन्हें एक और आदेश मिला जो सभी प्रेमियों के लिए शिरोधार्य होना चाहिए। वह कहती हैं, जिस स्त्री से तुझे प्रेम है, उस पर मिलकियत करने की कोशिश कभी मत करना।
 
चंडीदास की ये पंक्तियां उनके सहज पंथ के दर्शन का निचोड़ हैं : साबार ऊपर मानुष सत्य ताबार ऊपर नाही। यानी सबसे बड़ा सत्य है मनुष्य, उसके ऊपर कुछ भी नहीं।
 
चंडीदास का सहज मार्ग शरीर को, इंद्रियों को और कामोन्माद को बड़ी सरलता से स्वीकार करता है। बल्कि वे मानते हैं कि प्रेम में उन्माद ही प्रार्थना का इत्र है। अपने शरीर को प्रार्थना का माध्यम मानना और सहजस्फूर्त प्रेम करना ही सहजीय पंथ है। यह पूजा-अर्चना का महत्वपूर्ण अंग है। अपने गीतों में वे कहते हैं:
 
सौंदर्य का अर्क
उमगता है शाश्वत खेल से
जहां हर पुरुष कृष्ण है
हर स्त्री राधा है
समर्पित प्रेमी
प्रेम करते हुए
गंतव्य तक पहुंचते हैं
 
ध्यान रहे, सहजीय प्रेम उत्तेजक ऊष्म प्रेम नहीं है। इस प्रेम में वासना नहीं, प्रार्थना है। उनका मानना है कि दोनों प्रेमी पहले अपने आप में परिपूर्ण हों जैसे बादल और बिजली, बांसुरी और उंगलियां -तभी वे सहज-सम्मत पवित्र प्रेम कर पाते हैं। सहज मार्ग कामुकता या उच्छृंखल वासना नहीं सिखाता, बल्कि इंद्रियों के द्वारा आत्मा तक पहुंचने का रास्ता दिखाता है। ऐसा प्रेम तभी संभव है जब काम विशुद्ध हो, इंद्रिय सुख लोलुपता से परे हो और संभोग ही समाधि बन जाए। चंडीदास ने यह सब साध लिया लिया था, इसीलिए वह व्यक्ति नहीं, एक लेजेंड बन गए।
 
चंडीदास को बंगाली कविता का जनक कहा जाता है। उन्होंने प्रेम और भक्ति की जो धारा शुरू की, वही बाद में गोविंद दास, रवींद्रनाथ टैगोर और अन्य बंगाली कवियों में भी विकसित हुआ। उनके गीत यहां ऐसे गाए जाते हैं जैसे देश में रामायण या गीता के श्लोक सुनाए जाते हैं। और जैसी कि भारतीय परंपरा है, जिसका नाम हर जबान पर होता है, वह कब पैदा हुआ, कहां रहता था- इसी की जानकारी लोगों को नहीं होती। उनके जीवन प्रसंगों की जानकारी थोड़ी- बहुत उनके गीतों से ही मिलती है। उसके ऐतिहासिक सबूत नहीं हैं।
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