निधिवन में रात को कोई नहीं जाता

Nidhivan is most famous Sacred, Mysterious and Religious place in Mathura, Vrindavan. It also called holy City of Vrindavan. There are lots of Myths about Nidhivan.

Nidhivan is covered with small green trees. Vrindavan saint says that these are not trees. These are devotees of Lord Banke Bihari. It is place of appearing Shri Banke Bihari by Swami Shri Haridas Ji Maharaj. Here after 8 P.M, not only people but also any kind of insects, animal and monkey’s can’t stay here. After 8 P.M lord Radha and Krishna act their Ras Lila in Nidhivan and if anyone will try to see it either he will blind, dumb or dead and if he will alive then he will not in condition to tell anyone what happens in night. The Nidhivan is full of mysterious.


निधि शब्द का अर्थ सूरत क्रीड़ा से है। ग्रंथों के अनुसार निशातकाल में निधुवन के केलिकुंज में युगल (राधाकृष्ण) का शयन विलास होता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अ‌र्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। शयन के लिए पलंग लगाया जाता है तथा प्रात: बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहा निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद (माखन मिश्री) भी ग्रहण किया है।

रात्रि के समय निधिवन में कोई प्राणी नहीं रहता है, पशु-पक्षी भी नहीं। लोगों का मानना है कि अगर कोई व्यक्ति इस परिसर में रात्रि में रुक जाता है और भगवान की क्रीड़ा का दर्शन कर लेता है, तो सासारिक बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसे उदाहरण विगत कई वर्षों में देखने में भी आये हैं।

विशाखा कुंड--

निधिवन में स्थित विशाखा कुंड के बारे में कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण सखियों के साथ रास रचा रहे थे, तभी एक सखी विशाखा को प्यास लगी। कोई व्यवस्था न देख कृष्ण ने अपनी वंशी से इस कुंड की खुदाई कर दी, जिसमें से निकले पानी को पीकर विशाखा सखी ने अपनी प्यास बुझायी। इस कुंड का नाम तभी से विशाखा कुंड पड़ गया।

बांकेबिहारी का प्राकट्य स्थल--

विशाखा कुंड के साथ ही ठा. बिहारी जी महाराज का प्राकट्य स्थल भी है। कहा जाता है कि संगीत सम्राट एवं धु्रपद के जनक स्वामी हरिदास जी महाराज ने अपने स्वरचित पदों का वीणा के माध्यम से मधुर गायन करते थे, जिसमें स्वामी जी इस प्रकार तन्मय हो जाते कि उन्हें तन-मन की सुध नहीं रहती थी। बांकेबिहारी जी ने उनके भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर उन्हें एक दिन स्वप्न दिया और बताया कि मैं तो तुम्हारी साधना स्थली में ही विशाखा कुंड के समीप जमीन में छिपा हुआ हूं।

स्वप्न के आधार पर हरिदास जी ने अपने शिष्यों की सहायता से बिहारी जी को वहा से निकलवाया और उनकी सेवा पूजा करने लगे। ठा. बिहारी जी का प्राकट्य स्थल आज भी उसी स्थान पर बना हुआ है। जहा प्रतिवर्ष ठा. बिहारी जी का प्राकट्य समारोह बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। कालान्तर में ठा. श्रीबांकेबिहारी जी महाराज के नवीन मंदिर की स्थापना की गयी और प्राकट्य मूर्ति को वहा स्थापित करके आज भी पूजा-अर्चना की जाती है। जो आज बाकेबिहारी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

निधिवन कहने से सहसा किसी वन का दृश्य मस्तिष्क में आ जाता है, वास्तव में यहा आने पर वन जैसा ही दृश्य देखने को मिलते हैं, यहा के वृक्ष आज भी अपनी पौराणिकता को दर्शाते हैं। इन वृक्षों को देखने से आभास होता है कि यह अति प्राचीनकाल से स्थापित वृक्ष हैं। इस प्रकार के वृक्ष वृन्दावन में निधिवन, सेवाकुंज एवं तटियस्थान पर ही देखने को मिलते हैं, इन वृक्षों की खासियत है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिल पायेंगे तथा इन वृक्षों की डालिया नीचे की ओर झुकी हुई प्रतीत होती हैं। मान्यता है कि ये वृक्ष भगवान को प्रणाम करने की मुद्रा में हमेशा झुके रहते हैं। इन वृक्षों के बारे में शास्त्रों गोपी रूप से वर्णन किया गया है।

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