परमेश्वर की शरण में जा
वेदों का तात्पर्य ब्रह्म को जानना है। जिस प्रकार सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रायोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ज्ञानी पुरुष का समस्त वेदों में उतना ही प्रायोजन रह जाता है। अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावो ध्यात्ममुच्यते। भगवान कहते हैं कि परम अक्षर अर्थात जिसका कभी नाश नहीं होता वह सच्चिदानंदधन परमात्मा ब्रह्म है और उसके स्वरूप को अध्यात्म के नाम से संबोधित किया जाता है।
 
इस देह में यह जीवात्मा ब्रह्म का ही स्वरूप है। वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति तथा त्रिगुणमयी माया से परे है। वह परमात्मा तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य तथा सब भूत-प्राणियों के हृदय में विशेष रूप से स्थित हैं। 
 
सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतो क्षिशिरोमुखम्।
सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।
 
अर्थात : वह परब्रह्म सब ओर हाथ पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है। प्रकृति के तीन गुण सात्विक, राजस तथा तामस माने गए हैं। सत्वगुण से विवेक शक्ति, रजोगुण से लोभ, विषय भोगों की लालसा तथा तमोगुण से कत्र्तव्य कर्मों में अप्रवृत्ति एवं अज्ञान बढ़ता है। यह जीवात्मा श्रोत, चक्षु, त्वचा, रसना और नाक आदि इंद्रियों तथा मन का आश्रय लेकर सांसारिक विषयों का सेवन करता है।
 
परन्तु वह परब्रह्म इंद्रियों से रहित होते हुए भी इंद्रियों के विषयों को जानने वाला है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस  और गंध इंद्रियों के विषय बतलाए गए हैं। वह परब्रह्म परमात्मा चराचर सब भूतों के बाहर भीतर परिपूर्ण है। वह परब्रह्म परमात्मा विष्णु रूप से भूतों का धारण-पोषण करने वाले, रुद्र रूप से संहार करने वाले तथा ब्रह्मा रूप से सबको उत्पन्न करने वाले हैं। जिस प्रकार जीव की आंखें स्वयं को नहीं देख सकतीं, इसके लिए उसे दर्पण की आवश्यकता है। उसी प्रकार जीव को स्वयं के स्वरूप को जानने के  लिए आत्म ज्ञान, अर्थात ब्रह्म तत्व को जानने की आवश्यकता है। बाल्यावस्था में समझ का अभाव, युवावस्था में समय का अभाव तथा वृद्धावस्था में समर्थता का अभाव इत्यादि कारण बता कर जीव अपने अमूल्य मानव जीवन में इस ज्ञान से वंचित रहता है। सम्पूर्ण प्राणी मात्र उन परमपिता परमात्मा का सनातन अंश है। भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता जी में अर्जुन के प्रति कहते हैं, ‘‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावने भारत।’’ कि तू सब प्रकार से उस परमपिता परमेश्वर की ही शरण में जा। उनकी कृपा प्रसाद से ही तू परम शांति तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
 
आत्म ज्ञान को प्राप्त करने की एकमात्र पात्रता है, अंत:करण की शुद्धता, जिन्होंने अपने अंत: को शुद्ध नहीं किया है ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते। भगवान श्री कृष्ण ही उस अविनाशी परब्रह्म के, अमृत के, नित्यधर्म के अखंड एकरस आनंद के आश्रय हैं। स्वार्थ और अभिमान का परित्याग कर श्रद्धा और प्रेम भाव से जो निरंतर भक्तियोग में स्थित होकर वासुदेव गोविंद भगवान को स्मरण करते हुए उन्हें भजता है, वह प्रकृति के तीनों गुणों से मुक्त होकर सच्चिदानंद धन ब्रह्म  को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है। जीव को चाहे वेद, पुराण और शास्त्र का ज्ञान न हो। अगर वह भगवान के कहे इस वाक्य से श्रद्धा रखता है।
 
‘‘जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतिन्त ये। ते ब्रह्म तद्विदु:  कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चारिवलम्।’’- भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त मेरे शरण होकर जरा (बुढ़ापा) और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को सम्पूर्ण अध्यात्म को तथा सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। इस प्रकार जान कर वह भक्तियुक्त पुरुष भगवद् कृपा का पात्र बन जाता है।
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