पांडवों को सर्प दंश

होशियारपुर में पांच हजार साल पहले पांडव वंश के एक शासक ने एक ऐसा यज्ञ किया था, जिसमें दुनिया के तमाम सर्पों की आहूति दी गई थी। इस जगह का नाता है महाभारत के अभिमन्यु से उस अभिमन्यु से जिसे चक्रव्यूह बनाकर मार दिया गया था। इस जगह पर आज भी सैकड़ों किलोमीटर दूर से वो लोग आते हैं जो सर्प दंश के शिकार होते हैं। होशियारपुर में ऐसे रहस्य मौजूद हैं, जिन्हें देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसके एक-एक रहस्य को जानने से पहले जरूरी है उस कथा के बारे में जानना जिसका नाता है पांडवों के राज पाठ और उनके आखिरी वंशज से।

महाभारत कथा में कौरवों ने महाभारत में युद्ध के दौरान एक चक्रव्यूह की रचना की थी। उस चक्रव्यूह को केवल अर्जुन भेद सकते थे। लेकिन उस समय वो वहां नहीं थे। अभिमन्यु अर्जुन का पुत्र था। कहते हैं कि जब वो अपनी मां सुभद्रा के गर्भ में था तभी अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदने की कला का बखान किया था। लेकिन दिक्कत ये थी चक्रव्यूह के सात द्वार थे। और जन्म से पहले अभिमन्यु ने सिर्फ छह द्वारों को भेदना जान सका था। लिहाजा सातवें द्वार पहुंचते ही उसे मार दिया गया। लेकिन इससे भी भयानक स्थिति ये हुई कि अभिन्यु के मरते ही अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चलाकर गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के बेटे को भी मारने की कोशिश की। लेकिन भगवान कृष्ण ने उसे बचा लिया। बच्चे का नाम था परीक्षित।

राजा परीक्षित को ऋषि ने दिया शाप:-महाभारत के युद्ध के बाद कुछ सालों तक पांडवों ने हस्तिनापुर पर राज किया। लेकिन जब वो राजपाठ छोड़कर हिमालय जाने लगे तो राज का जिम्मा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को दे दिया गया। परीक्षित ने पांडवों की परंपरा को आगे बढ़ाया। लेकिन यहां पर विधाता कोई और खेल, खेल रहा था। एक दिन मन उदास होने पर राजा परीक्षित शिकार के लिए जंगल गए थे। शिकार खेलते-खेलते वह ऋषि शमिक के आश्रम से होकर गुजरे।

ऋषि उस वक्त ब्रह्म ध्यान में आसन लगा कर बैठे हुए थे। उन्होंने राजा की ओर ध्यान नहीं दिया। इस पर परीक्षित को बहुत तेज गुस्सा आया और उन्होंने ऋषि के गले में एक मरा हुआ सांप डाल दिया। जब ऋषि का ध्यान हटा तो उन्हें भी बहुत गुस्सा आया और उन्होंने राजा परीक्षित को शाप दिया कि जाओ तुम्हारी मौत सांप के काटने से ही होगी। और यही वह किस्सा है जिसका इस जगह से नाता है। राजा परीक्षित ने इस शाप से मुक्ति के लिए तमाम कोशिशे की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत:- राजा परीक्षित ने हर मुमकिन कोशिश की कि उनकी मौत सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे उपाय किए ऐसी जगह पर घर बनवाया जहां परिंदा तक पर न मार सके। लेकिन ऋषि का शाप झूठा नहीं हो सकता था। जब चारों तरफ से राजा परीक्षित ने अपने आपको सुरक्षित कर लिया तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आए। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था। मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राज परीक्षित को डस लिया।

राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे और इस जगह का नाता उसी राजा जनमेजय से है जो अपने पिता की मौत की वजह से सारे सर्पों के दुश्मन बन गए। जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे। लेकिन इस जगह से उनका क्या नाता था और यहां खुदाई में आखिर ऐसा क्या मिला जिससे ये साबित होता है कि जनमेजय यहां आए थे या फिर यहीं कहीं उनकी राजधानी थी। दरअसल, कहानी के हिसाब से जनमेजय सारी सर्प जाति के ही दुश्मन बन गए थे। इस कथा में जो जगह है वो पंजाब में है। पंजाब के होशियारपुर जिले में एक गांव है जहूरा। इसी गांव में कुछ दिनों पहले खुदाई की गई थी जहां तमाम ऐसे रहस्य सामने आए जो पांडवों की इस वंश श्रृंखला से मिलते हैं।

राजा जनमेजय का सर्प मेध यज्ञ:- राजा जनमेजय जब गद्दी पर बैठे तो सबसे पहले यही उपाय सोचने लगे कि किस तरह से इस धरती सारे सांपों का सफाया हो जाए ताकि कोई और परीक्षित इनका शिकार न हो। होशियारपुर में एक जगह ऐसी भी है जो एक हवन कुंड की तरह है। कहते हैं कि राजा जनमेजय ने ऋषियों के कहने पर धरती से सांपों के सफाए के लिए इसी जगह पर सर्प मेध यज्ञ किया था।

इस जगह से तकरीबन 25 वर्ग मील में हवन कुंड बनाया गया था। हवन कुंड तक पहुंचने के लिए हाथी के सूंड के आकार की एक नाली बनाई गई थी जिसमें मंत्र उच्चारण के बाद घी डाला जाता था। कहते हैं कि उस यज्ञ का ऐसा असर पड़ा कि पांच पांच मील लंबे सांप दूर से आ आकर इस हवन कुंड में गिरने लगे थे। इस तरह देखते ही देखते सांपों की अठारह नस्लें खत्म हो गई। जनमेजय को इंतजार तक्षक नाम के उस सांप का था, जिसके काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। काफी इधर-उधर भागने के बाद जब कोई रास्ता नहीं बचा तो तक्षक ने भगवान इंद्र की शरण ली थी।

कैसे खत्म हुआ सर्प मेध यज्ञ:- सर्प मेध यज्ञ में एक-एक कर धरती के सारे सांप इस हवन कुंड में भस्म हो जाते थे, लेकिन वो तक्षक सर्प अपनी रक्षा के लिए भगवान इंद्र की शरण में चला गया। इंद्र उसकी रक्षा के लिए आगे आना तो चाहते थे। लेकिन यज्ञ इतना विशाल था कि वो तक्षक की कोई मदद नहीं कर पाए। किसी तरह राजा जनमेजय से ही यज्ञ को समाप्त करने के लिए जाल बुना गया और इस काम के लिए वासूक नाम का नाग आगे आया। सबसे पहले वह आस्तिक ऋषि के आश्रम में गया। वहां जाकर उनसे विनती की कि वो किसी तरह इस यज्ञ को खत्म करा दें।

फिर ऋषि आस्तिक राजा के पास पहुंचे। राजा से कहा कि ठीक है जो हुआ वो अच्छा नहीं हुआ। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि किसी एक प्रजाति के जीवों को पूरी सृष्टि से ही साफ कर दिया जाए। राजा जनमेजय को लगा कि ऋषि ठीक कह रहे हैं और इस तरह यज्ञ समाप्त कर दिया गया। लेकिन इसके बाद इस जगह से राजा राजपाठ छोड़कर जंगल में जाकर संन्यासी हो गए। और यहीं से थोड़ी दूर पर है वो जंगल भी जहां राजा जनमेजय से जुड़े तमाम निशान मिलते हैं।

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